आर्यधर्म

आर्य पुनर्जागरण का आह्वाहन

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ये अन्ना की हार नहीं है...

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ANNA

एक किसी सत्तर साला किसान पुत्र जिसने राष्ट्रीय प्रतिज्ञा की खातिर ही देश के लिए भारतीय सेना में सेवा की, जिसने मात्र किताबी बातें ही नहीं की या देशभक्ति के हिंदी फ़िल्मी गीत नहीं गाए, या देह पर राष्ट्रीय चिन्हों की नुमाइश करके खोखले देशप्रेम की नुमाइश में अपना समय जाया नहीं किया बल्कि उसने रण क्षेत्र में उतर कर मातृभूमि के लिए शत्रु से लोहा लिया और गोलियां खाई I उस पचहत्तर साल के युवा बूढ़े ने मात्र सामाजिक विसंगतियों और भ्रष्टाचार का रोना ही नहीं गाया बल्कि मल की नाली में उतरकर अन्य की सहायता के बिना स्वयं ही उस कालिख को मिटाने का प्रयत्न भी किया I वो कोई फ़िल्मी प्रचार नहीं कर रहा था, नाही वो चुनाव जीतने के लिए भीड़ जुटा रहा था.. वो अकेले ही देश में व्याप्त कालिख को इंगित करने का प्रयास कर रहा था i वो अपने सुन्दर शरीर या अपनी अमीर कंपनी का प्रचार नहीं कर रहा था बल्कि चुनाव जीतकर बड़े संवैधानिक पदों पर किसी शहंशाह की तरह बैठकर अनैतिक मनमानी करने वाले दुराग्रही नेताओ को शाश्त्रीय राजधर्म का निर्देश देने के लिए राजघाट पर बैठा था उन नेताओ को जो यह भूल गये हैं की वो सत्ता के ऊँचे सिंहासनो पर मात्र जनता की सेवा के लिए भेजे गये हैं I
पर अगर नैतिक शिक्षा में हमारे पूर्वजो ने शास्त्र के साथ शस्त्र की महत्ता को स्वीकारा है तो वो युहीं नहीं हैं I अगर योगेश्वर कृष्ण ने धनुर्धारी अर्जुन को अपने धर्म च्युत संबंधियों और नैतिकता से निम्न बुजुर्गो पर शस्त्र उठाने का निर्देश दिया था तो वो बिना प्रयोजन तो नहीं ही होगा..
कोई चोर खुद ही को सजा के योग्य नहीं मान सकता, अगर अपराधी स्वयं ही अपराध के लिए सजा स्वीकार करने के लिए आवश्यक विवेक रखता हो तो प्रथम वो अपराधी ही क्यों हो? मनुष्य की प्रवृत्ति है अगर उसे दृष्टि से परे रख कर अपनी करने दी जाये तो वो धर्म ग्लानी या अपराध करेगा ही.. करोडो में किन्ही ५-१० उच्च शील धारी पुरुषो को छोड़ दें तो हर समाज में चरित्र से अशक्त मनुष्य जिसे सजा का कोई डर न हो या जिस पर न्याय का पाश पहुँचता न हो, या जिसे नर रहते हुए भी हरि जैसी स्वछंदता दे दी गयी हो वो भी असीमित अनियंत्रित शक्तिशाली अधिकारों के साथ तो ऐसे का पुरुषो का अपराध करना निश्चित है i
ऐसे लालची पुरुषो के समूह का जो महिलाओं के चोगो के पीछे छुप कर अपने कार्य कलाप करते हो तो अवश्य ही वे बड़े अपराधो को जन्म दे रहे होंगे. और ऐसा ही अब तक होता रहा और आज भी होता जा रहा है पर उन अपराधियों को आज भी जरा भी भय नहीं है.. वह दल शासन करना जानता है, वर्षो से निर्दयता पूर्वक इस बिचारे देश पर राज करता रहा है वह अपने शत्रुओ, राष्ट्र के नहीं, को कुचलना जानता है !! वो आज फिर विजयी है और दम्भ्पूर्वक अट्टहास कर रहा है..

अन्ना की टीम को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं I कौन हारा है? और कौन जीता है? अन्ना हारा है या नहीं, बाबा रामदेव हारे हैं या नहीं या कोंग्रेस जीती है या नहीं …..ये मुझे नहीं मालूम, पर यह फिर से स्थापित हो गया की भारत वर्ष की नपुंसकता ही हमेशा जीतेगी.. कापुरुषो से भरी नरमुंडो की इस बस्ती में हमेशा उनकी कायरता जीतती रही है .. आज फिर से वही पददलित, दबी कुचली जाति जिसके मान, गौरव को हजार साल से जड़ से नष्ट किया जाता रहा है और जो जाति आज तक अपने पौरुष को जगा नहीं पाई वह जाति जिसे हारने और डरने की आदत हो चुकी है ..वो जाति जो अभी भी स्त्री देवताओ की पूजा करके किसी शक्ति को अपने अन्दर जागृत करना चाहती रहती है, वह जाति जो अभी भी आकाश से किसी अवतार के अवतरण की ही प्रतीक्षा में रहती है… वह जाति जो इश्वर की कल्पना छः या दस हाथो के रूप में ही करना चाहती है वह जो राष्ट्र नेताओ को अपनी मनघडंत बचकानी कल्पनाओ में ही ढूंढना चाहती है , वह जाति जो अपने पौरुष को कब का हार चुकी है … वो आज भी अपमानित होकर हार रही है!!!

यमन, सीरिया, मिश्र, लीबिया जैसे छोटे देश भी कहीं जागरूक हैं जहाँ सही और गलत का सामान्य जनता को भी भान है पर भारतदेश, जिसे कइयो ने ‘भारत-माता बना कर रखा है मानो नपुन्सको का जमावड़ा बन कर रह गया है! वो देश गरीब हो या छोटे हो पर एक मामले में इस देश से बेहतर हैं! यह देश ऐसा है जहाँ पुरुषो की शूरवीरता मात्र शयन कक्ष में दिखती है या फिर हिंदी फिल्मो के आदर्श नायको की तरह किसी स्त्री के लिए लम्पटता का प्रदर्शन करने में, स्थापित सामाजिक मूल्यों और धार्मिक मान्यताओ को तोड़ने में या फिर फूहड़ अनैतिक अवैध करतूत करने में !! हजार सालो से जूते खा रही इस नस्ल को आज भी नहीं मालूम की उसका शत्रु कौन है!
यही हालात किसी भी अन्य देश में हुए होते तो आज कोंग्रेस नाम की इस चीज का नामोनिशान मिट गया होता… पर जिस तरह से देश के दुश्मन आतंकवादी भी पाप करके जीवित हैं वैसे ही यह पार्टी भी अपराधियों, भ्रष्टाचारियो, देशद्रोहियों, आतंकवादियों को पालने के बावजूद अपनी राजसत्ता पर विद्यमान है!!
जिस दल की नेता भारत में विधवा होकर बिना किसी व्यवसाय के करते दुनिया की चौथी सबसे धनी राजनेता (बिना पद के राजनेता?) बनकर लगभग १८ अरब डौलर या पच्चास हजार करोड़ रुपयेकी संपत्ति बना लेती है, एक नाजी सिपाही के रूप में रूस और इटली के लिए जासूसी करने वाले और बाद में मिस्त्री-मेसन बनकर काम करने वाले पिता स्टेफैनो यूजीन मैनो की मुश्किल से हाई स्कूल पास बेटी अन्टोनिया मैनो (जिसका रूसी नाम सोनिया है!), जिसने गरीबी के कारण अंग्रेजी विश्वविद्यालय में वेट्रेस का काम किया और जिसके पास धन कमाने वाली कोई योग्यता या डिग्री नहीं और एक आकलन के हिसाब से जिसकी वार्षिक आय ५० लाख से अधिक नहीं आज कैसे विश्व के उन बड़े उद्योगपतियों की कतार में खड़ी हो जाती है जिन्होंने वर्षो की कड़ी मेहनत से वह दौलत बनायीं होगी.. पर इस महिला ने, जिसे इस देश की भाषा भी नहीं आती कैसे इतने धन की स्वामिनी बन जाती है जिसकी एकमात्र उपलब्धि (फिरोज)खान- (फर्जी गाँधी) परिवार के युवराज और तबके भावी प्रधानमंत्री से शादी कर लेना ही था ?!!
कैसे इस रूसी जासूस की बेटी से शादी करने के बाद भारत के सारे शस्त्र आवश्यकताओ की आपूर्ति रूस से होने लग गयी, किस प्रकार राजीव गाँधी के नाम 2 अरब पौंड की पहली दलाली की किश्त १८ साल पहले ही पहुँच जाती है! (जिसके सबूत भी उपलब्ध हैं!)
ऐसी क्षमता प्राप्त स्वामिनी नेत्री से युक्त इस महान पार्टी के नाम कई खरब अरब राष्ट्रीय लूटपाट का श्रेय है, इस दल के नाम क्रांतिकारियों को फं साने, भगत सिंह और अन्य सभी राष्ट्रवीर क्रांतिकारियों को मरवाने, सुभाष चन्द्र बोसे जैसे महानतम राष्ट्र नायको को अंग्रेजो की मदद से समूचे विश्व में अपराधी बनाने और फिर उन्हें गुमनाम मौत देने (अनुज धर की नयी किताब और भी खुलासे करती है!) अंग्रेजो की चापलूसी कर अधिकारिक रूप से भारत को ब्रिटेन का उपनिवेश स्थापित करने, “अभी भी भारत को ब्रिटेन का गुलाम बनाये रखने” और फिर भी किसी “तथाकथित स्वत्रंत्रता” का श्रेय लेकर भारत पर शासन करते रहने वाली इस पार्टी के सभी राज बाहर आ चुके हैं i

देश को अपने स्वार्थ के लिए बाँटने वाली इस पार्टी, और शायद अपने लालच के लिए गाँधी को भी रास्ते से हटाने वाली, लाला बहादुर शास्त्री, पाइलट, सिंधिया, वाई एसार रेडी इत्यादि कई विरोधियो की जान लेने वाली इस पार्टी के देश की सुरक्षा, देश की एकता देश की समृद्धि के लिए खतरा साबित होने के बावजूद, इस देश की जमीन एक बार नहीं कई कई बार हारने वाली, देश की सम्पदा शत्रु, दलालों और अपने नेताओ के हाथो में लुटाने वाली, विभाजनकारी शक्तियों और देशद्रोहियों के सामने घुटने टेकने वाली, नक्सलियों, आतंकियों को समर्थन देने वाली इस महान पार्टी को जानने के बावजूद.. हम नहीं चेतते!!
बस इसी कोंग्रेस की कृपा से यह देश आज भी इंग्लैण्ड का गुलाम बना हुआ है.. जीहाँ अपने सही पढ़ा यह देश आज भी इंग्लैण्ड के राजा का औपनिवेशिक गुलाम है!! और भारत का राष्ट्रपति उस अंग्रेजी राजा का पहला नागरिक-गुलाम !!!
स्विस बैंक और अन्य काले धन के स्वर्गो द्वारा जारी और सर्वत्र उपलब्ध कोंग्रेसियो की काली सम्पातियो सूची के बावजूद कैसे वो नेता-अधिकारी निश्चिन्त विहार कर रहे हैं?
इतने पाप करने के बावजूद इस पार्टी के पास कौन सी ताकत है इस देश पर बार बार राज करने की? किन ताकतों के बल पर भारत की सरकार विदेशी शक्तियों को व्यापार करने, धर्मान्तरण करने, सांस्कृतिक धरोहरों की लूट करने, राष्ट्रीय चिन्हों को मिटाने, भारत का वास्तविक इतिहास मिटाने, भारत-हिन्दू राष्ट्र के वास्तविक नायको को अपमानित करने, विधर्मी संस्कृतियों को हिन्दू धर्म पर काबिज करने और भारत को हराने दे रही है??
किस प्रकार हम इस पार्टी और सरकार के झूठ और तानाशाही को सहन कर रहे हैं?
संविधान सभा ने जब भीम राव अम्बेडकर के नेतृत्व में जब संवैधानिक व्यवस्थाओ का स्थापन किया था तब विधायिका, न्यायपालिका इत्यादि के रूप में देश की सेवा के लिए कर्मठ और आदर्श व्यक्तियों को ध्यान में रखकर ही इस तंत्र पर पूरा विश्वास किया होगा वो तो सोच भी नहीं सकते थे की आगे चलकर ऐसा भी हो सकता है की सत्ता के शीर्ष पर बैठने वाले भी महा अपराधी हो सकते हैं ! वो सर्वशक्तिमान सत्ताधारी चाहे जिस भी दल के हों बिना निगरानी और दंड भय के अपनी स्वाभाविक लोलुपता, राजनैतिक स्वार्थ व्यक्तिगत हित और मनमानेपन के वशीभूत होकर देश के हित के विरुद्ध भी जा सकते हैं.. उन्हें क्या पता होगा की जिन विदेशी बेडियो से हमने इस देश को मुक्त कराया है उसी किसी एक विदेशी हाथो में इस देश की सत्ता दे दी जाएगी और देश की सारी शक्ति चरित्रहीन, निपट गंवार अपराधी प्रवृत्ति के हाथो में चली जाएगी जो हत्या लूट जैसे संगीन अपराधो के दोषी होंगे I देश के प्रति आदर्श सेवा भाव तो छोडिये ऐसे राजनीतिज्ञ देश चलाने लग जायेंगे जिन्हें अपने दायित्व, धर्म का क्या अपने सामान्य आचरण का भी ज्ञान नहीं होगा!! इस तरह के लम्पट, लोलुप, दुश्चरित्र और विकारी यहाँ तक की बेकार स्त्रियों के हाथो में सत्ता की बागडोर थमा दी जाएगी और देश की अथाह संपत्ति और राष्ट्र का वृहद् नियोजन निपट निरक्षर और अक्षम व्यक्तियों के हाथो में होगा I और फिर यही खोखली नेत्रिया देश की लुटिया डुबोएंगी I किसे पता था?
आज जेलों में हम छोटी चोरी करने वाले को तो बड़े ठसक से ठूंस देते हैं पर पर देश का लाखो, हजारो करोड़ स्वाहा कर देने वाले धृष्ट अपराधियों को हम छूना भी नहीं चाहते..क्यों?? सत्तर साल पहले जो व्यवस्था में कमी रह गयी थी उसीका पशचाताप है लोकपाल और (शासन-सत्ता और नौकरशाही में) भ्रष्टाचार निरोधी व्यवस्था का संगठन! हममे से वोही इस व्यवस्था से डरते हैं जो खुद किसी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं पर ऐसे तो चंद ही लोग हैं बाकि पूरा देश इस कदाचार और उसपे न हो पाने वाली निगरानी से त्रस्त और दुखी है.. देश में गरीबो की संख्या इसीलिए बढ़ रही है क्योंकि कुछ चंद व्यक्ति जिनके हाथ में देश की सम्पदा है उसे अपनी संपत्ति समझ कर उसे लूट खा जा रहे हैं I
और गरीब, बेचारी भारतीय जनता के पास ऐसा कोई साधन नहीं जिससे एक बार वोट देने के बाद उन गलत करने वाले राजनेताओ पर नियंत्रण किया जा सके या उन्हें सजा दी जा सके! आखिर ऐसी शक्ति यदि जनता को मिल जाये तो हमें कैसी आपत्ति और इससे किसे डरना चाहिए? आखिरकार दो लाख अत्यधिक शक्तिसंपन्न और जनता की दृष्टि से स्वतंत्र सरकारी अधिकारी-कर्मचारी-नौकरशाह या नेता पर निगरानी रखना आसान है या फिर एक लोकपाल और दसेक सहयोगियों पर? आखिर किन्हें डर है सरकारी कर्मचारियों पर ऐसी निगरानी से? जो स्वयं भ्रष्टाचारी हैं उन्हें ही इस तरह की व्यवस्था से असुविधा होगी.
पर, वास्तव में यह व्यवस्था तो सत्ता एवं अधिकार प्राप्त व्यक्तियों पर और खासकर जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं उनपर निगरानी के लिए ही है I इस देश में ऊपर से ही भ्रष्टाचार की गंगा बहती है तो इससे नीचे भी अनैतिक आचार पर रोक लगेगी I
पर स्वयं को आदर्श कहने वाले हम्मे से किसको इस से कष्ट है? कौन परोक्ष रूप से इस भ्रष्ट सरकार का साथ दे रहा है??
जानबूझकर अपने आँखों, कानो और मुंह पर ताला लगाकर हम देश की करोडो अरबो खरबों की क्षति करने में उन महा अपराधियों का सहयोग कर रहे हैं I

जो स्वयं को हिन्दू या भारतीय कहते हैं, जो तथाकथित तौर पर अपने को धर्मावलम्बी मानते हैं जो अपने को राष्ट्रभक्त कहते हैं जो अपने घरो में बैठकर वेद, पुराण, गीता, रामायण और महाभारत पढने का दंभ भरते हैं जो स्वयं को पुरुष कहते हैं और उनको हाथो में चूड़ियाँ पहन लेनी चाहिए या फिर महा अग्नि जलाकर खुद का जौहर कर लेना चाहिए!!!

हजारो सालो से हारते रहने के बाद और क्या क्या हार देना चाहते हैं हम? शायद कुछ लोगो को यह आन्दोलन किसी एक पार्टी के विरुद्ध लग रहा हो या ग़लतफ़हमी लग रही हो पर, ऐसा नहीं है… सौ सालो से यह पार्टी कुछ अच्छा करने की जगह इस राष्ट्रीय क्षति को होते देखती रही, और देखना ही नहीं नेताओ ने तो जनता की संपत्ति को लूटना अपना पेशा बना लिया है.. पर, यह पार्टी अगर पैसा ही लूटती तो कोई बात नहीं थी पर इस देश ने तो भारत की आत्मा की भी हत्या कर दी है!*

इस देश के ८० करोड़ पुरुषो को स्वयं को पुरुष मानना छोड़ देना चाहिए.. ऐसे पुरुषो को पुरुष कहलाने का अधिकार नहीं है..
निस्वार्थ देश के लिए लड़ने वालो को रोज शर्मसार करने वाले और राष्ट्र भक्तो को रोज ही अपमानित करने वाले भारतीयों को जीवित कहलाने का अधिकार नहीं है!!

अन्ना को क्यों विवश होना पड़ा राजनैतिक विकल्प की ओर मुंह करने का? आखिर एक अकेला आदमी और क्या करता? वो मंच पर हथियार उठाकर तो संघर्ष नहीं छेड़ सकता था, उसने तो पूरी कोशिश की जनता को जगाने की, ये तो जनता को दायित्व उठाना था I आखिर क्यों नेताओ को ठीक करने के लिए हम नेताओं की तरह अंधी गली में घुसें? कोई तो हो जो बाहर रहकर इस व्यवस्था को सुधारने और गलत करने वालो पर निगरानी करने का काम करे !पर, हमने तो खुली छूट दे राखी है जिसको जैसे राज करना है इस देश पर करता रहे हम कुछ भी नहीं करेंगे! बस, अपनी गरीबी, नेताओ की चोरी, देश में व्याप्त बेरोजगारी और अन्य समस्याओं का रोना रोते रहेंगे.. खुद तो कभी उसे सुधारने की कोशिश भी नहीं करेंगे और जब कोई उसे सुधारने को नेतृत्व प्रदान करे तो भी उसका साथ नहीं देते.. इस देश की स्थिति भयावह है क्योंकि इसमें अब वास्तविक भारतीय वास्तविक हिन्दू नहीं बसते अब बस विदेशी विचारधारा और विदेशी भीख पर पलने वाले ही इस देश में जिन्दा हैं वोही बम्बई, बैंगलोर, पुणे, आसाम, कश्मीर इत्यादि जगहों पर हजारो की भीड़ के साथ आन्दोलन करते हैं वोभी भारत देश के खिलाफ! पर देश के दुश्मनों के खिलाफ लड़ने की हिम्मत किसीमे नहीं है!?
आखिर इस देश की क्षत्रियता कहा गुम हो गयी है क्या वो बस जातिवाद तक सीमित हो गयी है? क्षत्रियता राष्ट्र-समाज-जाति के लिए शस्त्र उठाने वाली जन शक्ति का नाम है जो जाने कब से इस देश से लुप्त हो चुकी है!!

कितने निर्लज्ज हैं हम जो ऐसे नेताओ को खुली छूट दे रखी है देश के खजाने की जमकर लूट मचाने को, जब उसी देश की सेना का एक एक सैनिक चंद रुपयों के वेतन के लिए देश की रक्षा करने में और उसी नेता की सुरक्षा करने में अपनी जान गँवा देता है … एक फौजी मात्र अपनी निष्ठां-धर्म और कर्त्तव्य के लिए इस देश के लिए अपने सुख, परिवार की सुरक्षा और तो और प्राण तक गँवा देता है और उसी देश का नेता उस राष्ट्रीय संपत्ति का जमकर दोहन करता है जिसे उसकी निगरानी मात्र के लिए छोड़ा गया है!

क्या हमारी सेना को ऐसे निर्लज्ज, निकृष्ट लालची नेताओ और फिर ऐसे कायर देशवासियों की सुरक्षा करनी चाहिए? कैसे कर सकती है और क्यों कर करेगी? क्या भारतीय सेना विदेशी घुसपैठियों, देश द्रोहियों, आतंकवादियों, महाभ्रष्ट अधिकार प्राप्त नेताओ और नौकरशाहों, अपने कर्त्तव्य से रहित नागरिको और अपनी सेना और अपने देश के नाम से रहित हम नपुन्सको की रक्षा करने के लिए है?
क्यों वह सेना सरकार द्वारा अपने बड़े अधिकारियो को दिए घूस, कमीशन के दबाव से अपने कर्त्तव्य से हट जाये? क्यों नहीं सेना बाहरी शत्रुओ के अलावा भीतरी शत्रुओ के सफाए के लिए भी कुछ नहीं करती? क्यों नहीं सेना का वह काम हम करते हैं?

क्या इस देश में कोई पुरुष नहीं बचा है?
कब तक हम अन्ना और रामदेव को अपमानित होते देखते रहेंगे? कब तक राजीव दीक्षित, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस निर्दयतापूर्वक मारे जाते रहेंगे? हम कब अपनी वासनाओ से ऊपर उठेंगे? हम मुगलों द्वारा दी हुई उस कायरता से ऊपर कब उठेंगे? क्या एक हजार साल की दुर्दशा इतनी भारी है.. क्या अहिंदू भारतद्रोही अरबी मुगलिया संस्कृति इतनी हावी है की हम मात्र अपने बाहुबल पर अपने भविष्य का निर्धारण नहीं कर सकते?

क्या हमें अपने घरो अपने बिस्तरों की नरमी इतनी प्रिय है की राष्ट्रीय हित के लिए हम सडको पर भी नहीं आ सकते? शैतान की पूजा करने और पापियों की जयजयकार करने में हमें रस आने लग गया है? क्या हमारा कर्त्तव्य करने के लिए भी इश्वर को ऊपर से किसी और को भेजना पड़ेगा? क्या हमें ठीक पहचान है वो इश्वर का दूत देखने में कैसा होगा और कैसा नहीं ?

क्या हम भारत की मृत पड़ी लाश में राष्ट्रीयता की जान फूंकना चाहते हैं?
क्या हम इस देश की वास्तविक आजादी के लिए लड़ना चाहते हैं?
.
आखिर हम क्या चाहते हैं?

सोचिये…………………………………….. !!!



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