आर्यधर्म

आर्य पुनर्जागरण का आह्वाहन

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कब होता है नव वर्ष ? भाग २

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तो ये १ जनवरी को नया वर्ष कहाँ से आ गया ?

हमें ये गर्व पुर्वक जानना चाहिए की यवन यानि म्लेच्छों के सभ्यता स्त्रोत कहे जाने वाले रोमन और ग्रीक साम्राज्यों को हम आर्यों ने ही अपने उत्कर्ष काल में नेस्तनाबूद कर दिया था, जिस रोमन या ग्रीक सभ्यता को अंग्रेज या यूरोपियन इतिहासकार ३-४००० साल पुरानी बताते हैं वह ईसा की दूसरी शताब्दी तक संपूर्णतः समाप्त हो गए थे ! एक नया रहस्य सामने आया है की विक्रमादित्य ने रोमन सम्राट (?) जुलिअस सीजर को उसकी राजधानी में हरा उसे उज्जैन में लाकर गुलामों की तरह घुमा कर छोड़ दिया था (ज्योतिर्विदाभारण :महाकवि कालिदास !) आर्य शासन के समाप्त होने के बाद (गुप्त साम्राज्य के भंग होने के बाद लगभग ६५० ई . में) यूरोप के उस क्षेत्र से हिन्दू प्रभाव कम हो गया और उस समुदाय का ज्ञान भी खंडित हो गया ! इस हिन्दू प्रभाव समाप्त होने के कारण यह समुदाय काफी पिछड़ गया ! काफी काल पश्चात्, इस क्षेत्र के उपजे राजाओं द्वारा इस अखंड परंपरा को बदलने के लिए राजनैतिक जबरदस्ती से मनमानी तारीख से नए वर्ष कालों की स्थापना कर दी जिसमे वैज्ञानिक रूप से बड़ी खामियां थीं ! भारतीय काल गणना पर अपनी पहचान छोड़ने एवं प्रजा के जनमानस से विक्रमादित्य की प्रतिष्ठा गिराने के लिए जूलियस सीजर और बाद में सम्राट औगस्टीन इत्यादि ने पश्चिमी कैलेण्डर को मान्यता दी जिसमे कुछ “नया या अभारतीय” नहीं था सिवाय की जो ईसा मसीह (?) के खतना दिवस के एक सप्ताह बाद (या छठी पर) शुरू होता था ! अब मजे की बात आप को बता दूं, वास्तव में २५ दिसंबर को कोई इसा मसीह जैसा पैगम्बर पैदा नहीं हुआ था ! तो फिर ये ईसा मसीह या जीसस क्राइस्ट कौन है ? ये तो बस हमारे ही भगवान कृष्ण का नाम है ! वास्तव में भगवान तो भौतिक शरीर के देवो का नाम है जो परमात्मा है उसे तो प्राचीनतम काल से “ईश्वर” ही कहा जाता था यानि ईश्वर कृष्ण ! पर, यवनों की भाषावली में यह ईश्वर “ईशस” हो गया जो धीरे धीरे जीसस हुआ ! यानि ईश्वर कृष्ण = जीसस ख्रीष्ट =फिर ख्राईष्ट या क्राईष्ट हो गया ! जो समाज स्वयं को आज ईसाई , यहूदी या यहाँ तक की मुस्लमान कहता है वो तो महाभारत युद्ध के बाद का विस्थापित सिन्धुप्रदेशी या भारतीय ही था और जो कृष्ण की अर्चना २००० वर्षों से कर रहा था ! ईसाइयत आने यानि राजनैतिक शक्ति बनते ही ये नए वर्ष उनपर थोपे गए ! उसमे हठ, यातना एवं दुष्प्रचार तक का प्रयोग किया गया ! जो नव वर्ष आर्य तिथि पर मनाता था उसे ईसा दोही करके यातना और मूर्ख कहके उपहास दिया गया ! और इसीलिए उन देशों में १ अप्रैल को मूर्ख दिवस मनाया जाने लगा क्यों? क्योंकि भारतीय नव वर्ष २५ मार्च से लेकर ४ अप्रैल तक पड़ता था\है सामान्यतया १ अप्रैल के ही आसपास !!
तो भारतीय प्रभाव क्षीण होने के फलस्वरूप यह राजनैतिक और नकली पंथ का प्रतीक उस २५ दिसंबर के पहले हफ्ते में किया गया जिसकी कथा अलग ही है * (*अन्य लेख में)I
पश्चिमी कैलेण्डर ( ईस्वी सन ) में कुछ भी नया खोजने के बजाये , भारतीय कैलेंडर को लेकर सीधा और आसान बनाने का प्रयास किया गया था . प्रथ्वी द्वरा 365 / 366 में होने बाली सूर्य की परिक्रमा को बर्ष और इस अबधि में चंद्रमा द्वारा प्रथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मान कर कैलेण्डर तैयार किया गया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रख दिए गए . पहला महीना मार्च (एकम्बर) से नया साल प्रारम्भ होना था I
1. – एकाम्बर ( 31 ) , 2. – द्वीआम्बर (30) , 3. – त्रियाम्बर (31) , 4. – चतुर्थाम्बर(30) , 5.- पंचाम्बर (31) , 6.- षष्ठम्बर (30) , 7. – सेप्टेम्बर (31) , 8.- ओक्टाम्बर (30) , 9.- नबम्बर (31) , 10.- दिसंबर ( 30 ) , 11.- ग्याराम्बर (31) , 12.- बारम्बर (30 / 29 ), निर्धारित किया गया . ( सेप्तम्बर में सप्त अर्थात सात , अक्तूबर में ओक्ट अर्थात आठ , नबम्बर में नव अर्थात नौ , दिसंबर में दस का उच्चारण महज इत्तेफाक नहीं है.

वास्तव में हिन्दू काल पत्रिका या कालम्बर यानि की कैलंडर में दश ही मास हुआ करते थे दशम्बर तक, इसके बाद का मास कहलाता था अधिक मास, या मल मास और जिसे कहते थे पुरुषोत्तम मास या कृष्ण मास ! विष्णु या कृष्ण के अनुयायी गुप्त्वंशियो द्वारा स्थापित ही यह काल चक्र था यह स्थापित हो जाता है ! तो यह कृष्ण मास ही आज क्रिसमस के नाम से मनाया जाता है ! इसे X -मास भी भी कहते हैं जिसका अर्थ है X (रोमन में) दसवां महिना ! यानि दस मास ही होते थे और इस विशिष्ट मास, जिसे सबसे महान नायक के नाम पर पूजा जाता था (कौन था वो नायक ?*) और इस मास के पहले आनंदोत्सव मनाया जाता था, क्यों? क्योंकि यह मास पवित्र (एवं गंभीर*) माना जाता था, जैसे आज भारत में श्रावण माना जाता है (और उसके पहले महाराष्ट्र आदि में गटारी जैसे उत्सव मनाये जाते हैं) तो उसके पहले ही सारी उत्सवी हुडदंग मनोरंजन इत्यादि एवं उपहार आयोजन इत्यादि किये जाते थे ! इसका किसी भी पैगम्बर ईसा मसीह से कोई सम्बन्ध नहीं यह तो मात्र और मात्र परम आर्य नायक कृष्ण का ही शौर्य दिवस है * !!
तो, १५८२ में पोप ग्रेगोरी XIII ने जूलियन कैलंडर की जगह ग्रेगोरियन का नया कैलेंडर अपनाने का फरमान जारी कर दिया जिसमें १ जनवरी को नया साल का प्रथम दिन बनाया गया। और १ अप्रैल नव वर्ष की जगह मूर्ख दिवस बन गया। तो हम भारतीय आज अपने ही नव वर्ष का पहला दिवस मूर्ख दिवस के रूप में मनाकर प्रफुल्लित होते हैं और खतना दिवस (यानि विदेशी\पश्चिमी नववर्ष) को नया साल बना फूले नहीं समाते | कैसे हुआ ये?
इन मूढो की संस्कृति हम पर अंग्रेज शासको ने थोपी और जिसका पालन हम अभागे अभी तक क्ररते चले आ रहे हैं ! कितने पाप करेंगे हम ? चाणक्य ने अज्ञानता को सबसे बड़ा पाप बताया है !

तो अज्ञानियों ने नया साल वहां चुन लिया जहाँ उनको उचित लगा !
इस १ जनवरी को नए साल के रूप में मनाने की शुरुआत विभिन्न देशो में इस क्रम में हुई — यूक्रेन , लिथुआनिया , बेलारूस 1362, वेनिस 1522, स्वीडन 1529, पवित्र रोमन साम्राज्य (जर्मनी ~) 1544, स्पेन, पुर्तगाल, पोलैंड 1556, प्रूसिया , डेनमार्क और नॉर्वे 1559, फ़्रांस (रूस्सिल्लॉन के फतवे) 1564, दक्षिणी नीदरलैंड 1576, लोरेन 1579, डच गणराज्य 1583, स्कॉटलैंड 1600, रूस 1700, टस्कनी1721, ब्रिटेन , आयरलैंड और ब्रिटिश साम्राज्य छोड़कर स्कॉटलैंड 1752, ग्रीस 1923, थाईलैंड १९४१!
और ये भी देखें कि विश्व के कौन से देश अभी भी नव वर्ष मार्च और अप्रैल के मध्य मनाते हैं ?
ये हैं – ईरान, असीरिया, थाईलैंड, कम्बोदिआ, अरेबियन और इस्लामी भी नव वर्ष उसी काल दशा में मनाते हैं पर हिजरी संवत को प्रयोग करने के कारन अब उनके हर वर्ष में ११ दिनों का फेर आ गया है ! प्राचीन रोमन भी मार्च में नव वर्ष मनाते थे, सिखों का भी नव वर्ष चैत्र के पहले दिन ही आरम्भ होता है, बहाई धर्म, जोरोस्ट्रियन धर्म, तेलुगु लोगों में, तमिल, कन्नड़, बंगाली, पर्शियन, बेबीलोनियन, से लेकर सभी पूर्वी एशिया के देश जैसे थाईलैंड, बर्मा, लाओस, श्रीलंका और अन्य सभी देशों में अभी भी नव वर्ष अप्रैल में ही मनाया जाता है जो समय के साथ कुछ में कुछ दिन आगे पीछे हो गया है I नेपाल में भी विक्रम संवत ही नव वर्ष निर्धारित करता है ! ये ध्यान योग्य बात है कि विक्रमादित्य के शासन में सुदूर पूर्व से लेकर सुदूर पश्चिम तक एक ही वर्ष एवं सम्वत हुआ करता था, पश्चात् इस्लाम और ईसाई आक्रमणो के कारन इस वृहद् (भारत) क्षेत्र से इस वैश्विक परंपरा में अंतर आ गया !!
शुद्ध ज्योतिषीय ज्ञान के अभाव में, जो पहले विशिष्ट ब्राह्मणों के ही कर्म क्षेत्र में हुआ करता था, महान आर्य प्रभुत्व की अनुपस्थिति में विश्व के पिछड़े देशों ने गलत परंपरा का पालन किया.. पर हम क्यों उसका पालन करें ? नेहरु के कहे अनुसार, हमारी खोज किसी विदेशी के कहने पर नहीं हुई है !
हमारा नव वर्ष तो हमें होली का आनंद और वसंत का उल्लास अनुभव करते ही प्रत्यक्ष हो जाता है !
प्रतिपदा का दिवस सूर्य की सबसे उर्जावान रश्मियों को लेकर ऋतू के सबसे मनोरम समय को लेकर आती है, जब पादपो जंतुओं में नए उत्साह का संचार हो रहा होता है, नई कोपलें, नए बौर, पंछियों का उत्साही कलरव स्वयं ही बताता है की बसंत आ गया है इसका दिसंबर के ठिठुरते , जमे अकड़े मृत प्राय अवधि का हमारे अपने नव वर्ष से क्या तुलना ?
यही नव वर्ष है जब सारी सृष्टि स्फूर्तिमान, नवीन और उर्जा मयी होती है ! जब इस सृष्टि का प्रजापति हमारा पिता सूर्य हमसे सबसे समीप होता है !
भारत में नई फसल कटती है वसंत एवं अन्न पोषण का उत्सव हम कई त्योहारो के रूप में मानते हैं जैसे उगाडी जो युगादि का अपभ्रंश है जो चैत्र में ही मनाया जाता है, गुडी पड़वा महाराष्ट्र में, पंजाब में बैसाखी, आसाम में बिहू , राजस्थान में थापना, मलयाली “विशु”, मैथिलि “जोड़े शीतल”, ओडिया “विशुन संक्रांति”, सिंध प्रदेश में चेती चंद (चैत्र का चन्द्र) का आनंद समस्त समुदाय लेता है I वहीँ मणिपुर में इसी दिन यह दिवस “सजिबू नोंगमा पम्बा” के नाम से, तमिल में पुथांडु के नाम से, वहीँ मॉरिशस, इंडोनेशिया, बाली के हिन्दू इसे “नयेपि” के नाम से मानते हैं ! ……यहाँ तक कि कई ईसाई या धर्म विहीन क्षेत्रों में भी इसी दिन नव वर्ष के उल्लसित आयोजन किये जाते हैं जैसे गोआ में !!
और भी मजे कि बात है ईसाईयों का ईस्टर त्यौहार जो पुराने ईसाईयों के मान्य है, उसी अटूट परंपरा का इतने उत्पीड़न एवं अत्याचार के बाद भी, पालन ही है !! थेल्मिक नव वर्ष भी इसी दिन मनाया जाता है !! सबसे बड़ी बात, इंग्लैण्ड में १७५२ से पहले तक नव वर्ष मात्र इसी दिन मनाया जाता था और आज भी ड्रुईड लोग जिसका स्मरण एवं आयोजन करते हैं !!
कैसे सभी पूरे विश्व में एक ही दिन के आसपास इस नव वर्ष का स्वागत करते हैं !? इसके अपवाद में बस वोही पश्चगामी समुदाय थे जिनके वर्ष किसी व्यक्ति के नाम से शुरु हुए नहीं तो समूचा विश्व ही लगभग उसी दिन नव वर्ष मनाता है !?
और यही नव वर्ष आज भी उन्ही क्षेत्रों में अब तक मनाया जाता है बस उनके स्वरूप नाम थोडा बदल गए हैं ! नव वर्ष प्रारंभ के पहले पखवाड़े या सप्ताह को या पूरे मास को ही उत्सव के रूप में मनाया जाता है ! जैसे किर्गिस्तान, रूस आदि में नव बहार के नाम से वास्तव में तब बहार भी होती है और नया साल भी I फिर मध्यपूर्व के अन्य क्षेत्रो(ईरान, ईराक, परसिया, मध्य एशिया के सभी देश जैसे उज्बेकिस्तान, औघुड एवं बहाई इत्यादि) में “नव रोज” के नाम से नया दिन मनाया जाता है ! यह नाम स्वयं प्रत्यक्ष है ! भारत में इसको “नव रात्रि” के नाम से जाना जाता है और इसमें (बाद के *) भारतीय पुजारियों ने देवियों की पूजा प्रारंभ कर दी जबकि मूल धर्म में यह ऐसा नहीं था, इसीका विरोध इस्लाम करता है !! इस्लाम में यह नव वर्ष रमजान के नाम से मनाया जाता है जब ऋतू संधि पर अनुशासन का ही अभ्यास इस अवधि का परम लक्ष्य था ! रमजान और कुछ नहीं “राम ध्यान” है और यही भारत में लोग रामनवमी मनाकर करते हैं ! तो राम कौन हैं यह आगे फिर कभी !*
नए वर्ष के प्रथम दिवस या प्रथम सप्ताह या प्रथम पक्ष को ही नव दिवस माना जाता था इसे “नव रात्रि” कहना थोडा गलत ही था.. पहली बात, यह नव यानि “नया” था नाके संख्या “नौ” और यह नया दिन ही हो सकता है क्योंकि वर्ष सूर्य आधारित है इसलिए नया दिवस ही अधिक उपयुक्त है नाकि “नौ रातें” यह अपभ्रंश गलत लोगों, गलत शिक्षा, धर्म के क्षरण एवं धर्म में आये मनोरंजन भाव के कारण हुआ !!
नव वर्ष के दिन काल्पनिक देवियों की आराधना करना (काल्पनिक इसलिए क्योंकि मूल (वैदिक) धर्म में यह देवियाँ नहीं थीं!) वास्तव में हमारे प्रवर्तक का विस्मरण एवं अपमान है !
पर पिछले आघातों में जैसे हम सब कुछ भूल गए अपने राष्ट्र अधिष्ठाता को भूल गए, अपने धर्म को भूल गए अपने संस्कारो, साहित्य, इतिहास इत्यादि और अपने नव वर्ष को भी भूल गए !
तो हम देख सकते हैं कि हर तरह कि घृणा, भीषण औपनिवेशिक आक्रमणो, हठपूर्वक इसके विरोध, कई वर्ष पश्चात् भी पूरा विश्व उसी एक नायक को याद कर रहा है उसी एक महान काल कि स्मृति को याद कर रहा है जिसने समस्त ज्ञात विश्व में अपनी जड़ें जमायीं थी ! सोचिये हम कहाँ हैं ? हम क्या कर रहे हैं ?
नव वर्ष पर अपने प्रवर्तक महान विक्रमादित्य या(नि) भगवान श्री राम को याद करें , परमेश्वर महादेव को याद करें सृष्टि में बाकि हर वस्तु उन्ही की छाया उनका प्रतिबिम्ब है तथाकथित शक्ति भी ! पुरुषो को तो शिव और श्रीराम की ही आराधना करनी चाहिए I इससे विचलन ही हमारे महानाश का आधार बना है* !
वर्ष २०१४ का नव वर्ष का प्रथम दिवस ३१ मार्च को पड़ रहा है मैं अपने सभी भारतीय (यानि वृहद् भारत *) भाइयों और बहनों को इसकी अग्रिम बधाई देता हूँ, आशा करता हूँ की हम अपनी गुलामी की ये छाप अपने मष्तिष्क से उठा कर फेंक देंगे जबकि मैं जानता हूँ की इस देश में अभी कई निर्बोधी अविश्वासी लोग हैं जो जल्दी अपना गुलामी का चोला फेंकना नहीं चाहते ! फेंक दीजिये यह चोला, बस अब ही तो वो काल दशा है नए आह्वाहन का नयी दिशा का ..सर्वत्र यही गुंजायमान है क्या आप सुन पा रहे हैं ! यह वर्तमान ध्वनी हमें उसी प्राचीन गौरव से जोडती है आपका गौरव .. हमारा गौरव !!

इस अन्वेषण में मुझे कोई ८ साल लगे हैं जिसके कई उद्धरण हैं और बहुत कुछ और भी जानने बताने को है !!
ref – आचार्य बालकृष्ण लेख, विकिपीडिआ, पी एन ओक, गुरुदत्त, तेज सिंह धामा,ज्योरिविदाभरण, सायर उल ओकुल, वायु पु., ब्रह्माण्ड पु., वैवस्वत, ऋग्वेद, इत्यादि ५० अन्य संकलन !

धन्यवाद

डा. शैलेश
काशी



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