आर्यधर्म

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कब होता है नव वर्ष ?

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कब होता है नव वर्ष? क्यों होता है वर्ष नया ? क्या किसी राजा, अधिकारी तानाशाह या सरकार के ही कहने से नया वर्ष शुरू हो जाना चाहिए शुद्ध वैस्विक भारतीय परंपरा में केवल ज्योतिषी (जो ब्राह्मण होने कि योग्यता रखते थे), ही इन विषयों के पुरोधा थे ! यह परंपरा विश्व में बस भारत में ही विकसित हुई और यहीं से सारा विश्व इस पद्धति परम्परा का जानकार हुआ! हम कैसे कह सकते हैं ऐसा कि यह भारत का दिया हुआ विधान है जो पूरे विश्व में लागू है?
रूस और अमेरिका इत्यादि बड़े देशो में आधुनिक कालगणना चक्र से कई समय अंतराल हैं (टाइम जोन) जैसे रूस में ९ (१६ पूर्व में) ऐसे जोन हैं पर रूस का अधिकारिक समय बस मॉस्को से ही निश्चित किया जाता है. आज घडी का समय १२ बजे शुरू होता है रात के बारह बजे!! अब सोचें, जब हम कुछ शुरू करते हैं तो शुरू होने जैसा कुछ होना भी चाहिए जैसे शिशु पैदा होता है तो यह प्रत्यक्ष है; पर रात्रि में दिन शुरू कैसे हो सकता है जब उसके छह घंटे और छह घंटे पीछे एक जैसा अँधेरा होता है ? तो “रात” में “दिन” कैसे शुरू हो सकता है ? यूरोप में यह निर्धारण रोम या बाद में इंग्लैण्ड में हुआ करता था आज यह इंग्लैण्ड में स्थित है (ग्रीनविच मीन टाइम) I क्यों ? क्योंकि समूचा यूरोप एक समय भारतीय हिन्दू सम्राटों के शासन व्यवथा के अंतर्गत आता था ‘आंग्ल स्थान’ जो बाद में इंग्लैण्ड कहलाया इस आर्य साम्राज्य कि सबसे पश्चिमी सीमा थी और जिस द्वीप को द्रविड़ यानि आदरणीय ब्रह्मणो के लिए सुरक्षित रखा गया था* (उल्लेख कभी और!), क्योंकि यह साम्राज्य सुदूर पूर्व से लेकर सुदूर पश्चिम तक था (जव द्वीप से आंग्ल स्थान) तो इस पूरे साम्राज्य में समय का मापन निर्धारण एवं प्रसार एक ही जगह से होता था यानि आर्यावर्त के केंद्र से ! कहाँ था यह आर्यावर्त का वेधन केंद्र? क्या काम था इसका ?
आइये जरा सोचें कि भारत में दिन कब शुरू होता है ? भारतीय परंपरा और सामान्य मनुष्य भी यही कहेगा कि जब सूर्य पहली बार दीखता है यानि सूर्योदय को ही दिन कि शुरुआत कह सकते हैं ! बिलकुल ठीक, जब अँधेरा प्रकाश में बदलता है तभी दिवस का प्रारम्भ कहा जाता हैI तो भारत में सूर्योदय कब होता है यह काल सुबह ५.१५ से लेकर ५.४० तक होता है औसत यह समय उषाकाल ५.३० बजे आती है ! आपको मालूम है जब भारत के मध्यतम भाग में सुबह के ५.३० बज रहे होते हैं तो सुदूर पश्चिमी सीमा यानि आंग्ल द्वीप पर कितने बज रहे होते हैं ? रात के ठीक बारह बजे !! जब भारत में सुबह होती थी तो सूर्य आराधना के साथ बाबा विश्वनाथ पर जल चढाने और सूर्य भगवान् पर अर्ध्य देने के साथ ही मंदिरों के घंटे बजने शुरू हो जाया करते थे ये घंटे काशी, अवंतिका से लेकर अर्वस्थान, एवं आंग्ल देश तक हर हिन्दू नगर में बजा करते थे ! इसलिए, इंग्लैण्ड में रात के बारह बजे जब सबसे गहरी नींद में होती है दुनिया और कोई भी इतने ठन्डे देश में उठकर रात में ठीक बारह बजे वो भी दिन के प्रारंभ को बताने के लिए घंटा नहीं बजाएगा, पर राजकीय आदेश का पालन करने हेतु ही इस कष्टकारी आदेश का पालन किया जाता था I चर्चों में घंटे उसी परंपरा का अंग है, और समय का पालन उसी आर्य हिन्दू परंपरा का अनुकरण है !
तो ये तो दिवा के प्रारंभ होने का कारण हुआ और वर्ष ?
भारत वर्ष में काल गणना बहुत प्राचीन है पर जो उत्कर्ष है वो आचार्य वराहमिहिर के काल में आया था, जो विश्व आराध्यसम्राट विक्रमादित्य के प्रधान ज्योतिष एवं नवरत्नों में एक थे, आर्यभट और ज्योतिषीय गणित के प्रकांड ऋषि जैसे भास्कराचार्य इत्यादि के प्रताप स्वरुप इसका फलित और प्रचलित रूप स्थापित किया गया ! इसके लिए पुरे साम्राज्य में कई बड़ी वेध शालाएं (रूस तक) स्थापित की गयीं जिसमे से अधिकतर ध्वंस कर दी गयी हैं पर जो केन्द्रीय वेध शालाएं और सबसे वृहद्-गूढ़ केंद्र दिल्ली में थी इस पूरे ज्योतिषीय संकुल का नाम था मिहिरावली I अन्य भी कई वेधशालाएं कामरूप (आसाम) से लेकर गांधार तक थीं वो सब तोड़ी जा चुकी हैं उसके बाद बनी नई वेधशालाएं ही आज जयपुर, दिल्ली, काशी उज्जैन इत्यादि में सुरक्षित हैं ! पर उससे पहले भी हमारे कई ज्ञान केन्द्रों में अनवरत शोधो अध्ययनों के बाद प्रचुर ज्ञान के संकलन से हमारे पास ज्ञान का प्रचुर भंडार हो गया था . यह सब भारत के हिन्दू काल यानि भारतीय इतिहास के स्वर्ण काल में ही हुआ था !
और महान भारतीय ऋषियों ने, यानि विश्वविद्यालयी प्राचार्य एवं पंडितों ने वो सब पा लिया था जो आज आधुनिक वैज्ञानिक खोजने की कोशिश कर रहे हैं !!
तो नव वर्ष कब होता है और क्यों ?
भारतीय कालगणना के अनुसार इस पृथ्वी के सम्पूर्ण इतिहास की कुंजी मन्वंतर विज्ञान में है, इस ग्रह के सम्पूर्ण इतिहास को १४ भागों अर्थात मन्वन्तरों में बांटा गया है| एक मन्वंतर की आयु ३० करोड ६७ लाख और २० हजार वर्ष होती है, इस पृथ्वी का सम्पूर्ण इतिहास ४ अरब ३२ करोंड वर्ष का है| इसके ६ मन्वंतर बीत चुके हैं और ७वां वैवश्वत मन्वंतर चल रहा है| मतलब लगभग १८५ करोड वर्ष बीत चुके है, और इतने ही और कुछ ज्यादा वर्ष बीतने बाकी है | हमारी वर्त्तमान नवीन (जीव) सृष्टि १२ करोड 5 लाख 33 हजार 1 सौ चार वर्ष की है| ऐसा युगों की कालगणना बताती है| पृथ्वी पर जैव विकास का सम्पूर्ण काल ४,३२,००,००.०० वर्ष है| इसमे बीते 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 1 सौ 11 वर्ष के दीर्घ काल में ६ मन्वंतर प्रलय, ४४७ महायुगी खंड प्रलय तथा १३४१ लघु युग प्रलय हो चुके हैं| पृथ्वी और सूर्य की आयु की अगर हम भारतीय कालगणना देखें तो पृथ्वी की शेष आयु ४ अरब 50 करोड 70 लाख 50 हजार ९ सौ वर्ष है तथा पृथ्वी की सम्पूर्ण आयु ८ अरब 64 करोड वर्ष है| सूर्य की शेष आयु 6 अरब 66 करोड 70 लाख ५० हजार 9 सौ वर्ष तथा इसकी सम्पूर्ण आयु 12 अरब 96 करोड वर्ष है| विश्व की सभी प्राचीन कालगणनाओ में भारतीय कालगणना प्राचीनतम है| इसका प्रारंभ पृथ्वी पर आज से प्रायः 198 करोड वर्ष पूर्व वर्त्तमान श्वेत वराह कल्प से होता हैं, अतः यह कालगणना पृथ्वी पर प्रथम जीवोत्पत्ति या मानवोत्पत्ति से लेकर आज तक के इतिहास को युगात्मक पद्धति से प्रस्तुत करती है, काल की इकाइयों की उत्तरोत्तर वृद्धि और विकास के लिए कालगणना के हिन्दू विशेषज्ञों ने अंतरिक्षिय ग्रहों की स्थिति को आधार मानकर पंचवर्षीय, 12 वर्षीय और 60 वर्षीय युगों की प्रारंभिक इकाइयों का निर्माण किया. भारतीय कालगणना का आरम्भ सूक्ष्मतम इकाई त्रुटी से होता है, इसके परिमाप के बारे में कहा गया है कि सुई से कमल के पत्ते में छेद करने में जितना समय लगता है वह त्रुटी है, यह परिमाप 1 सेकेण्ड का 33750 वां भाग है| इस प्रकार भारतीय कालगणना परमाणु के सूक्ष्मतम ईकाई से प्रारंभ होकर काल कि महानतम ईकाई महाकल्प ()तक पहुंचती है| पृथ्वी को प्रभावित करने वाले सातों गृह कल्प के प्रारंभ में एक साथ एक ही अश्विन नक्षत्र में स्थित थे, और इसी नक्षत्र से भारतीय वर्ष प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष) का प्रारंभ होता है, अर्थात प्रत्येक चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथमा को भारतीय नववर्ष प्रारंभ होता है| जो वैज्ञानिक द्रष्टि के साथ- साथ सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना को प्रस्तुत करता है| भारत में अन्य संवत्सरो का प्रचलन बाद के कालों में प्रारंभ हुआ जिसमे अधिकांश वर्ष प्रतिपदा को ही प्रारंभ होते हैं,

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यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष पूर्व ब्रह्माजी ने जगत की रचना प्रारंभ की।

और यह रहस्योद्घाटन सबसे प्रथम बार प्रस्थापित करी गयी पराक्रमी हिन्दू सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में, महान हिन्दू साम्राज्य का चक्रवर्ती राज्य विश्व में अपनी प्रभुता स्थापित करने के बाद विक्रम संवत के रूप में इसी दिवा से आर्य हिन्दू धर्म के स्वर्णिम युग का प्रारब्ध किया ! ये महाज्योतिषी पं . वराहमिहिर की विलक्षण प्रतिभा व् वृहद् पांडित्य मंडली द्वारा निर्देशित हुआ ! विक्रमी संवत का पहला दिन उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर था, न कोई अपराधी, और न ही कोई भिखारी था। वह चक्रवर्ती सम्राट था जिसने समस्त विश्व में * हिन्दू राज्य स्थापित कर दिया और जिसने स्वयं भगवान् विष्णु के सदृश्य “परम भागवत” पद अर्जित किया !! सम्राट विक्रमादित्य द्वारा आज से ठीक २०७१ वर्ष पहले (५७ ई. पू. में) इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन यह अखंड राज्य स्थापित किया था।

युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5112 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना। नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।

१. गुरू अंगददेव प्रगटोत्सव: सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस।
२. समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
३. संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए ।
४. शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।

यानि यह नव वर्ष कम से कम ५००० वर्षों से तो मनाया ही जा रहा है I

भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व :
1. वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2. फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
3. नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।

भारतीय महीनों के नाम उस महीने की पूर्णिमा के नक्षत्र के नाम पर पड़ते हैं I जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं तो इसमास का नामकरण “चैत्र” हुआ। श्री मद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के द्वितीय अध्याय के अनुसार जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर थे उसी समय से कलियुग का प्रारम्भ हुआ, महाभारत और भागवत के इस खगोलिय गणना को आधार मान कर विश्वविख्यात डॉ. वेली ने यह निष्कर्ष दिया है कि कलयुग का प्रारम्भ 3102 बी.सी. की रात दो बजकर 20 मिनट 30 सेकण्ड पर हुआ था। क्रान्ती वृन्त पर बारहों महीने की सीमायें तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किये गये और नाम भी तारा मण्डलों के आकृतियों के आधार पर रखे गये। जो मेष, वृष, मिथून इत्यादित 12 राशियां बनी।
चूंकि सूर्य क्रान्ति मण्डल के ठीक केन्द्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगता है। प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक मास कहलाता है I
भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अन्तर नहीं पड़ता जब कि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते है। इस प्रकार प्रतयेक चार वर्ष में फरवरी महीनें को लीपइयर घोषित कर देते है फिर भी। नौ मिनट 11 सेकण्ड का समय बच जाता है तो प्रत्येक चार सौ वर्षो में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता है। अभी 10 साल पहले ही पेरिस के अन्तरराष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकण्ड स्लो कर दिया गया फिर भी 22 सेकण्ड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है जहां की सी जी एस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किये जाते हैं। रोमन कैलेण्डर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंग नुमापा जुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था। जिसे जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया उसके 1 सौ साल बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट भी बढ़ाया गया चूंकि ये दोनो राजा थे इस लिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गये। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिन समान है जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। यही नहीं जिसे हम अंग्रेजी कैलेण्डर का नौवा महीना सितम्बर कहते है, दसवा महीना अक्टूबर कहते है, ग्यारहवा महीना नवम्बर और बारहवा महीना दिसम्बर कहते है। इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8, 9 और 10 होते है। भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमूच सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवा भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर तो नवमअम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।
सन् 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नव वर्ष घोषित किया गया। जेंदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु 12 हजार वर्ष है। जबकि बाइविल केवल 2 हजार वर्ष पुराना मानता है। चीनी कैलेण्डर 1 करोड़ वर्ष पुराना मानता है। जबकि खताईमत के अनुसार इस धरती की आयु 8 करोड़ 88 लाख 40 हजार तीन सौ 11 वर्षो की है। चालडियन कैलेण्डर धरती को दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है। फीनीसयन इसे मात्र 30 हजार वर्ष की बताते है। सीसरो के अनुसार यह 4 लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है। सूर्य सिध्दान्त और सिध्दान्त शिरोमाणि आदि ग्रन्थों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है।
संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर (Hour) शब्द बना है। और इस जैसे असंख्य वर्ण अभी भी यूरोपियन शब्दावली में हैं ! इसमें कोई संशय नहीं रह जाता की विश्व का प्रथम दिवस यही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है और यही विश्व के नव वर्ष का प्रारंभ है !
तो ये १ जनवरी को नया वर्ष कहाँ से आ गया ?
(क्रमशः ……)



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
March 29, 2014

उत्तम आलेख के लिए आभार व् हिन्दू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं! आदरणीय शैलेश जी!


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